रेलवे की संपन्न औद्योगिक धरोहर को सहेजने की कोशिश

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भारतीय रेलवे 160 साल से भी ज्यादा पुराने और बेहद संपन्न इतिहास के साथ देश की मूर्त और अमूर्त विरासत के कई आयामों को संजोए हुए है।भारतीय रेलवे 160 साल से भी ज्यादा पुराने और बेहद संपन्न इतिहास के साथ देश की मूर्त और अमूर्त विरासत के कई आयामों को संजोए हुए है। भारतीय रेलवे की चार विरासत दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (1999), नीलगीरी माउंटेन रेलवे (2005), कालका शिमला रेलवे (2008) और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, मुंबई (2004) को यूनेस्को ने वैश्विक विरासत सूची में जगह दी है। इसके अलावा दो स्थल माथेरन लाइट रेलवे और कांगड़ा घाटी रेलवे को भी आनेवाले दिनों में धरोहर में शामिल किए जाने वाली विरासतों में यूनेस्को ने रखा है।

हालांकि, भारतीय रेलवे की भव्यता और ऐतिहासिक विरासत सिर्फ चार वैश्विक धरोहरों तक ही शामिल नहीं है। किसी भी दूसरे उद्योग की तरह भारतीय रेल ने भी बेहद तेजी से तकनीक को अपनाया है। उदाहरण के लिए भाप इंजन, मीटर गेज रेल, लकड़ी से बने यात्री डिब्बे अब भारतीय रेल के हिस्सा नहीं हैं। इनको धीरे-धीरे बाहर करने के साथ ही इनके रखरखाव की कई तरकीब भी भूलते जा रहे हैं। अब स्थिति यह है कि भाप इंजन वाल्व को सेट करने के लिए या फिर लकड़ी से बने सैलून के दरवाजों को ठीक करने के लिए कारीगर मिलना भी असंभव होता जा रहा है। कारीगरों को तो छोड़िए अब तो इन कोच में लगने वाले सामान जैसे ब्लॉक इंस्ट्रूमेंट, उनके टोकन, टोकन मशीन, सिग्नल मशीन, वैक्यूम एक्जॉस्टर जो कि तीन दशक पहले आम हुआ करते थे उन्हें भी अब पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है।

भारतीय रेलवे एक विशेष औद्योगिक धरोहर के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय विरासत में भी एक खास पहचान है। रॉलिंग मिल, क्यूपोला, ब्रेक ब्लॉक फाउंड्री जैसी चीजें जो किसी भी पुराने रेलवे वर्कशॉप में पाई जाती थी वो सिर्फ भारतीय रेलवे की सिर्फ ऐतिहासिक पहचान ही नहीं बल्कि उस वर्कशॉप का अभिन्न हिस्सा है। उसी तरह से ऐतिहासिक स्टेशन और दफ्तर जैसे मुंबई (विक्टोरिया टर्मिनस, बांद्रा सबर्बन, चर्चगेट), हावड़ा, गार्डन रिच (बीएनआर दफ्तर), चेन्नई एगमोर, रोयापुरम, लखनऊ, मदुरै इत्यादि उस शहर की पहचान हैं।

स्टेशन और कार्यालय भवन, लोकोमोटिव, कोच, वैगन, सामान, शिल्पकृति इत्यादि को जब संभालकर रखा जाएगा और उसे लोगों को दिखाया जाएगा तो आनेवाली पीढ़ी के दिल में अपने इस विरासत के प्रति सम्मान बढ़ेगा और इतिहास को संजोया रखा जा सकेगा।

अपने औद्योगिक और जीवंत विरासतों को संभालने के लिए भारतीय रेलवे ने सतत प्रयास किया है और इसका लक्ष्य हमेशा साफ रहा है कि आनेवाली पीढ़ियां इसे देखें और महसूस करें। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रेल संग्रहालय, क्षेत्रिय रेल म्यूजियम चेन्नई, मैसूर और हावड़ा अपने अपने इलाके के मशहूर और ऐतिहासिक स्थल हैं।

भारतीय रेलवे ने करीब 230 भाप इंजन, 110 विशिष्ट कोच और वैगन को अलग-अलग जगहों पर संग्रहालय और हेरिटेज पार्क में लोगों को देखने के लिए रखा है। इनमें से कई 100 साल से भी पुराने हैं जो कि देखने वालों को अपने पुराने दिनों के गौरव की अनुभूति कराते हैं।

भारतीय रेलवे करीब 16 भाप इंजनों को कार्यरत विरासत के रूप में संभालकर रखा है। हालांकि, ये सभी रोज सेवा में नहीं रहते लेकिन ये संरक्षित भाप इंजनों को अभी भी सैलानी ट्रेनों या फिर प्रदर्शनी के लिए चलाया जा सकता है। रेवाड़ी स्टीम शेड को कार्यरत स्टीम शेड की यादों को ताजा रखने के लिए 2002 में रेवाड़ी हेरिटेज स्टीम सेंटर के नाम से पुनर्विकसित किया गया जो कि दुनिया में बेहद अनूठी उपलब्धि है। फिलहाल रेवाड़ी स्टीम सेंटर में छह बड़ी लाइन और चार छोटी लाइन के कार्यरत भाप इंजन का रखरखाव करता है। इन भाप इंजनों में "फेरी क्वीन" (1855) भी शामिल है जिसका नाम गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे पुराने कार्यरत इंजन के रूप में दर्ज हो चुका है। इसके अलावा यहां मौजूद भाप इंजन "अकबर" को ‘सुल्तान’ और ‘गदर’ जैसी कई बॉलीवुड फिल्मों में भी दिखाया जा चुका है।

यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (डीएचआर) और नीलगीरी माउंटेन रेलवे (एनएमआर) आज भी हर दिन भाप इंजन की सेवा देती है। डीएचआर के पास जहां 14 भाप इंजन हैं वही एनएमआर के पास छह भाप इंजन। भाप इंजन के कद्रदानों को ये देश-विदेश से अपनी ओर आकर्षित करती हैं। भाप इंजनों की खूबसूरती और आवाज पुराने दिनों की खूशबू और एहसास दिलाती है।  

भारतीय रेलवे के पास इमारत, पुल और ऊपरी मार्ग के रूप में कई ऐतिहासिक विरासत है। भारतीय रेलवे ने अब तक करीब 25 सेतु और 70 इमारतों को संग्रहणीय सूची में डाला है। इनमें से कुछ मुख्य हैं, कोलकाता के पास जुबली सेतु , नैनी के पास यमुना सेतु, सोन नगर सेतु, पंबन मार्ग सेतु, बांद्रा सबर्बन स्टेशन, प्रताप विलास पैलेस, वडोदरा, ग्लेनोगल बंग्ला मुंबई, एसईआर हेडक्वार्टर कोलकाता इत्यादि। भारतीय रेलवे इन निर्मित विरासतों को संभालकर रखने के लिए खासतौर से कोशिश कर रहा है।

तकनीक के विकास और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच से अब विरासतों को सिर्फ संग्रहालय और प्रदर्शनियों या फिर मुख्य जगहों जैसे स्टेशन या प्रमुख इमारतों में प्रदर्शित करने तक ही सीमित नहीं रख सकते। भारतीय रेलवे तकनीकी के क्षेत्र में साझेदारी कर पूरे देश में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए वर्चुअल म्यूजियम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वर्चुअल संग्रहालय में सभी रेल विरासतों जैसे भाप इंजन, कोच, इमारत, सेतु, पुराने कागजात और कारीगरी को इंटरनेट के जरिए दर्शाया जाएगा, जिसे कोई भी अपने मोबाइल पर देख सकेगा।

इस वर्चुअल मीडियम को सह भागीदारी के जरिए चलाया जाएगा ताकि लोग और समाज ऑनलाइन ही इसे और मजबूत बनाने में अपना योगदान दे सके। देश के कुछ बड़े संग्रहालयों में कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू भी किए जा चुके हैं जिसमें रेलवे की विरासत से संबंध जानकारी ऑन लाइन ही दी जारी है। ये छात्रों, सैलानियों और शोधार्थियों के साथ ही आम लोगों के लिए भी बेहद रोचक है।

भारतीय रेल मंत्री ने अपने 2016 के रेल बजट में इस बात पर जोर दिया था कि रेलवे की वैश्विक धरोहरों और संग्रहालयों के जरिए पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा। भारतीय रेल की विरासत को संभाकर रखने और इससे जुड़ी जानकारियां भारतीय जन मानस तक पहुंचाने से एक सजग समाज और देश के निर्माण में हम योगदान दे सकते हैं। अतुल्य भारत की मुहिम भारतीय रेल और इससे जुड़ी संस्थाओं का एक सबसे बड़ा सामाजिक दायित्व है और रहेगा।

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